दिल्ली। गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी के बिना बताए मायके में रात रुकने पर पति द्वारा थप्पड़ मारना क्रूरता के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने इस पुराने मामले में पति दिलीपभाई मंगलाभाई वरली को आरोपों से बरी कर दिया।
जस्टिस गीता गोपी ने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी घटना को क्रूरता साबित करने के लिए लगातार और असहनीय मारपीट के ठोस सबूत जरूरी हैं। आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी के कृत्य और पत्नी की आत्महत्या के बीच सीधा और नजदीकी कारण संबंध था। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई संबंध साबित नहीं हुआ।
मामला मई 1996 का है। सेशंस कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में दिलीपभाई को धारा 306 के तहत सात साल और धारा 498A के तहत एक साल की सजा सुनाई थी। अपीलकर्ता ने 2003 में इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अपील में दिलीपभाई की ओर से दलील दी गई कि आरोप सामान्य झगड़े तक सीमित थे और दहेज की मांग या उकसाने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। विवाद पति के रात में बैंजो बजाने और देर से लौटने को लेकर होता था। राज्य की ओर से अभियोजन पक्ष ने सजा बरकरार रखने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष किसी भी तरह के लगातार क्रूर व्यवहार, मेडिकल रिकॉर्ड या पहले की शिकायतें पेश नहीं कर सका। ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त सबूत के बिना सजा दी थी। इसलिए हाईकोर्ट ने दिलीपभाई को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि घरेलू मामलों में सिर्फ सामान्य विवाद या मामूली मारपीट को क्रूरता नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि गंभीर अपराध सिद्ध करने के लिए ठोस और प्रत्यक्ष सबूत अनिवार्य हैं।

