केरल का मलयालम बिल: कर्नाटक ने जताई चिंता, CM सिद्धारमैया ने पिनराई से बातचीत का आग्रह किया

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दिल्ली। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को पत्र लिखकर प्रस्तावित मलयालम भाषा बिल पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह बिल कासरगोड जैसे कर्नाटक-केरल सीमा वाले जिलों में कन्नड़ माध्यम स्कूलों में मलयालम को अनिवार्य करने का प्रावधान करता है। CM सिद्धारमैया ने पत्र में कहा कि अगर यह बिल पास हुआ, तो कर्नाटक भाषाई अल्पसंख्यकों और संविधान द्वारा दी गई बहुलवादी सुरक्षा का उपयोग कर विरोध करेगा।

सिद्धारमैया ने पत्र में लिखा कि यह पत्र आपसी सम्मान, सहकारी संघवाद और साझा संवैधानिक जिम्मेदारी की भावना से लिखा गया है। दोनों राज्य न केवल भौगोलिक रूप से जुड़े हैं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी घनिष्ठ संबंध रखते हैं। उनका कहना है कि किसी भी नीति से बच्चों पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा और अल्पसंख्यक स्कूलों की व्यवस्था प्रभावित होगी। कासरगोड में बड़ी आबादी कन्नड़ माध्यम शिक्षा पर निर्भर है और दशकों से सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल बना हुआ है। CM ने केरल सरकार से आग्रह किया कि बिल पर पुनर्विचार किया जाए और पहले बातचीत की जाए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350A और 350B भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार और मातृभाषा में शिक्षा की सुरक्षा करता है। मलयालम भारत की प्रमुख द्रविड़ भाषाओं में से एक है, मुख्य रूप से केरल और लक्षद्वीप में बोली जाती है। यह 22 अनुसूचित भाषाओं में शामिल है और 2013 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त किया। मलयालम शब्द “मलय” (पहाड़) और “आलम” (भूमि) से बना है, यानी “पहाड़ों की भूमि की भाषा।” यह भाषा प्राचीन तमिल से विकसित हुई और पैलिंड्रोम शब्दों में से एक है।

सिद्धारमैया का मानना है कि बातचीत और संवैधानिक मूल्य सम्मान के माध्यम से दोनों भाषाओं और समुदायों के हितों की रक्षा की जा सकती है, जिससे बहुलवाद और भारत की एकता मजबूत बनेगी।

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