‘सैनिक’ मांओं से सौतेला व्यवहार: नगर सेना की महिलाएं आज भी 6 माह के मातृत्व अवकाश से वंचित

Step-motherly treatment of 'soldier' ​​mothers: Women in the city army are still denied 6 months of maternity leave.

छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल बीत चुके हैं, लेकिन नगर सेना में पदस्थ महिला कर्मचारियों की समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। सबसे गंभीर मुद्दा 6 माह के सवैतनिक मातृत्व अवकाश का है, जिसे केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट महिलाओं का संवैधानिक अधिकार मान चुके हैं। इसके बावजूद नगर सेना की महिलाओं को यह सुविधा अब तक नहीं मिल पाई है।

इस अधिकार को लागू कराने के लिए कई बार शासन को प्रस्ताव भेजे गए। बीते एक साल में डिप्टी सीएम स्तर से दो बार फाइल शासन तक पहुंची और समीक्षा भी हुई, लेकिन वित्त विभाग से अनुमति न मिलने के कारण हर बार मामला अटक गया। नतीजा यह है कि नगर सैनिक महिलाओं को मजबूरी में नो वर्क–नो पेमेंट के तहत छुट्टी लेनी पड़ती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

राज्य में वर्तमान में लगभग 9 हजार नगर सेना कर्मचारी पदस्थ हैं, जिनमें करीब 2600 महिलाएं शामिल हैं। ये महिलाएं कानून-व्यवस्था, सुरक्षा, छात्रावास, ट्रैफिक और आपदा प्रबंधन जैसे अहम दायित्व निभाती हैं, लेकिन मातृत्व जैसे संवेदनशील समय में उन्हें कोई संरक्षण नहीं मिलता।

एक महिला नगर सैनिक ने बताया कि डिलीवरी के बाद उन्हें केवल दो माह की छुट्टी मिली, जबकि तबीयत खराब होने के कारण पहले भी एक माह की छुट्टी लेनी पड़ी थी। इसके बाद छह माह से वे बिना वेतन घर पर हैं। पति की सीमित आय में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। छोटे बच्चे की देखभाल के लिए मजबूरी में नौकरी से दूर रहना पड़ रहा है। कोरबा और बिलासपुर की अन्य महिला कर्मचारियों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश कोई रियायत नहीं, बल्कि महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है, जो उनके सम्मान, स्वास्थ्य और समानता से जुड़ा है। बावजूद इसके, नगर सेना की महिलाओं को आज भी इस अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि ‘सैनिक’ मांओं के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार की तस्वीर भी पेश करती है।

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