रायपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक के 120 से ज्यादा गांवों के किसान दीमक के प्रकोप से दहशत में हैं। दीमकों का डर ऐसा है कि किसानो को यहां रबी की फसल लेने से पहले किसान कई बार सोचता है। रायगढ़ से बंगुरसिया के रास्ते घने जंगल में दीमक की बड़ी-बड़ी बांबी है, जो पेड़ों से चिपकी हुई 4 से 5 फीट की ऊंचाई तक बनी हुई है। बड़े-बड़े पेड़ इन कीटों की जद में हैं और किसानों के खेतों के मेड़ में इनका बसेरा है। तमनार ब्लॉक में आने वाले 120 से अधिक गांवों में से ज्यादातर गांव के किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं।
जंगलों में भी दीमक का भयंकर प्रकोप
रायगढ़ से झारसुगुड़ा मार्ग पर 15 किलोमीटर आगे बढ़ते ही घने जंगल में रास्ते से ही दीमक का भयंकर प्रकोप नजर आने लगता है। जहां तक नजर जाती है, इनकी बांबी पेड़ों से लिपटी दिखाई देने लगती है। हजारों पेड़ दीमकों के प्रकोप से सूख चुके हैं। इस रास्ते पर आगे 30 किलोमीटर तक बढ़ते हुए यही आलम है। ओडिशा सीमा पर हमीरपुर गांव से पहले देवगांव से ही खाली खेत नजर आने लगते हैं। किसान बताते हैं कि ये सूखे खेत पानी की कमी की वजह से नहीं, बल्कि दीमक की समस्या की वजह से हैं। किसान इनके डर से रबी में खेती नहीं करते। इन गांवों में सिर्फ खरीफ की खेती करते हैं। अब मानसून आने के बाद खेती होगी।
बीज डालते ही चट कर जाते है दीमक
हमीरपुर समेत भागोरा, जोबरो, बंगुरसिया, पालीघाट, देवगांव, अमलिधोंधा, कांटा झरिया, समकेरा समेत कई ऐसे गांव हैं, जहां किसानों ने रबी की फसल नहीं ली है। इन गांवों में खेत के मेड़ में दीमक रहते हैं। रबी सीजन में जैसे ही किसी फसल का बीज डालकर किसानों ने बुआई की, दीमक बीज ही चट कर जाते हैं। किसान बताते हैं कि हमीरपुर के आसपास 15 किलोमीटर के दायरे में यह सबसे बड़ी समस्या है। इसलिए मजबूरी में सिर्फ बरसात में धान की फसल लेते हैं। क्योंकि खेतों में पानी भरा होने के कारण दीमक धान की फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते।
फसल लेने के लिए लगातार करनी पड़ती है निगरानी
हमीरपुर के किसान नरेश नायक बताते हैं कि दियार ने परेशान कर रखा है। उनके पास 2 एकड़ खेत है। खरीफ में वे एक एकड़ में 17-18 क्विंटल तक धान फसल लेते हैं। लेकिन रबी में खेत मजबूरी में सूखा छोड़ना पड़ता है। यहां सिंचाई के स्रोत तो नहीं है, सभी बोर पर ही निर्भर हैं। लेकिन जमीन समतल है, ज्यादातर घरों में कुआं है। 20-25 फीट में पानी आ जाता है। भूजल स्तर भी अच्छा है। इसके बाद भी रबी में दीमक की वजह से खेती नहीं कर पाते। इसके कारण ही हमारी सिर्फ 4 महीने की खेती है। बाकी 8 महीने किसी काम की नहीं। सब्जी की फसल भी बरसात के दिनों में ही लेते हैं। उसे भी लगातार निगरानी में रखना पड़ता है।
जैविक खाद भी बर्बाद कर देते है दीमक
इस गांव में ऋषि गुप्ता कृषि दुकान चलाते हैं। वे किसानों को कीटनाशक, बीज, खाद बेचते हैं। ऋषि बताते हैं कि उनका व्यापार 4 महीने का ही है। क्योंकि किसान 4 महीने ही खेती करते हैं। स्थिति तो यहां तक बन जाती है कि दीमक जैविक खाद को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इस क्षेत्र में 20 से ज्यादा गांवों में दीमक फसल को 100 फीसदी तक नुकसान करते हैं। करमागढ़, पाली, कनानी बाहरा जैसे गांवों में भी 50 फीसदी तक दिक्कत है। गांवों किसान पशुओं से फसल को बचाने के लिए लकड़ी खड़ी कर जो बाड़ लगाते हैं, उन तक को दीमक सालभर में बर्बाद कर देते हैं। इसलिए इस मिट्टी को कुदरी माटी करते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में दियार का बसेरा है।
बलुई और लाल मिट्टी में दीमकों का बसेरा
तमनार ब्लॉक के वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी उदित नारायण नगाइज बताते हैं कि इस पूरे क्षेत्र में बलुई मिट्टी, लाल मिट्टी है। इन मिटि्टयों में दीमक का बसेरा है। ब्लॉक के अधिकांश गांव में इनका प्रभाव है। किसानों को जागरूक करने के लिए समय-समय पर कीटनाशकों के जरिए दीमक को कम करने अभियान चलाते हैं। किसानों को यह भी बताया जाता है कि फसल को दीमक से कैसे बचाएं? दीमकों की बांबी इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा है।
ब्रीडिंग प्लेस को ढूंढकर खत्म करने से मिलेगी राहत
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. गजेंद्र चंद्राकर बताते है, कि दीमक के प्रकोप का सबसे बड़ा कारण उनके अनुकूल जलवायु और दीमकों की चाह फसल है। दीमक सेल्यूलोज चाव से खाते हैं। फसल से लेकर पेड़ का एक घटक सेल्यूलोज है। रायगढ़ के उस क्षेत्र में जंगल है, इसलिए लकड़ी बहुत है। इन्हें दो तरीके से कम किया जा सकता है।
सबसे पहले लोगों को मास स्केल पर जागरूक करना पड़ेगा। साथ ही इसके लिए माइक्रो सर्वे कर यह पता लगाना होगा कि इनका ब्रीडिंग प्लेस कहां है। इनकी बांबियों को जमीन के बराबर काटकर उसमें रेत व गड़ा नमक भरना पड़ेगा। क्लोरोपीरी फॉस जैसे कीटनाशकों का छिड़काव भी किया जा सकता है। अक्सर खेतों को तो उपचारित किया जाता है, लेकिन किसान मेड़ को छोड़ देते हैं। दीमक यहीं रहते हैं। चूंकि बारिश में खेतों में पानी भरा होता है, इसलिए खेतों में इनका प्रभाव कम होता है। लेकिन जहां सूखी जमीन होती है, जैसे मेड़ के किनारे जो फसल होती है, उसे ये नुकसान पहुंचाते हैं।
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